अंंधेरे से उजाला ढ़ूँढ़कर लाया

मैंने आज अंंधेरे से उजाला ढ़ूँढ़कर लाया है,

माँ तेरे लिए चाय का प्याला ढूँढ़कर लाया है,

अच्छा कि लॉकडाउन है फुर्सत में संग चाय पीते हैं,

चलो बात करें इसलिए मसाला ढ़ूँढ़कर लाया है।

युवा तुम हो आज के कर्मधार
तुमपर टिकीहै देश का पतवार
कर कोशिश सदा कभी न हार
मचादे अपने कर्मों से हाहाकार
समय को यूँ न जाने दे बेकार
फैला दे यश ताकि गूँजे संसार।

कहाँ से बता उठा है धुआँ
कहीं घना कोहरा तो नहीं
गरीबों की पीठ पड़ा फिर
मार कहीं दोहरा तो नहीं
हाहाकार मचाहै जगत में
सुनने वाले बहरा तो नहीं।
चलो तुम युवा शक्ति,
सदैव ही सम्मान से,
खेलो न कभी भी तुम,
किसी के अरमान से।

रत्नेश कुमार शर्मा

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