अक्षय नूर

(अक्षय तृतीया: ‘एक अक्षय विश्वास’ )


अक्षय है उसका क्षय कैसा
हे जीवन तुझसे भय कैसा।
तुम तो क्षणभंगुर है
पर तेरे पास अक्षय नूर है l

तेरे नयन अभिराम में
सारा संसार समाया है l
तेरे कर्ण पटल पर ही तो
प्रत्येक ध्वनि की छाया है ।

फिर भी तेरे नयन श्रवन पर
नहीं मेरा गुरूर है ।
तुम तो क्षण भंगुर है
पर तेरे पास अक्षय नूर है ।

तेरे मुख से मुखरित हो करके
मधुर शब्दों की धारा निकले ।
मन उपवन को सिंचित करके
सुमन सौरभ प्यारा निकले ।

इन अधरों के आधार भी
आज पास मेरे कल दूर है ।
तुम तो क्षण भंगुर है
पर तेरे पास अक्षय नूर है ।

लेखनी को पकड़ इतिहास गढ़े
कर कीर्ति का निर्माण करें ।
कर्म क्षेत्र विस्तृत करके
नित् नूतन का आह्वान करें ।

निर्मित पल, पल में मिटता है
पर करने की चाह प्रचुर है ।
तुम तो क्षणभंगुर है
पर तेरे पास अक्षय नूर है ।

पग प्रगति पर बढ़ते बढ़ते
एक आदर्श पहचान बनाता है ।
परिचय भी अतिशय होता है
ध्रुव तारों में जब छाता है ।

यायावर बन नभ छू कर भी
आगे बढ़ने का सुरूर है ।
तुम तो क्षण भंगुर है
पर तेरे पास अक्षय नूर है ।
*✍️संध्या रानी
सहायक शिक्षिका
देवघर।

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