ईद के बहाने प्यार व मोहब्बत के सामने मौजूदा चुनौतियां

सुधीर कुमार रंजन : मेरे जीवन पर सांझी संस्कृति और विरासत की अमीट छाप पड़ी है। बचपन से ही मैं अपनी दादी के साथ अपने गांव इब्राहिमपुर, पंचायत अमावां, जिला नालंदा (बिहार शरीफ) के पश्चिमी दिशा में स्थित एक दरगाह पर अमूमन हर शुक्रवार को लोहमान और प्रसाद चढ़ाने जाता था।वाजदफा मनोकामना पूर्ण होने पर मेरे परिवार के द्वारा वहां बली भी जाती रही है।ऐसा पूरे गांव वासियों के द्वारा भी की जाती रही है। लेकिन बचपन से मेरे मन में यह सवाल कौंधता रहा कि मेरे गांव में सैकड़ों वर्षों के इतिहास में एक भी इस्लाम धर्मावलंबी क्यों नहीं है ? बचपन से ही गांव से विस्थापित होने की वज़ह से शाय़द मैं अपने मन का सवाल नहीं ढूंढ सका। खैर,बाद के दिनों में स्कूल और कॉलेजों में भी मेरे अभिन्न मित्र के रूप में इस्लामिक लोग ही रहे। तबके समय में लंच आवर में एक साथ खाना,खेलना, कूदना होता था और एक दूसरे के घर पर जाकर खुब मस्ती करना अपने जीवन की शगल थी,उस समय तक हम-सब साथियों के बीच में मज़हबी मतभेद तो क्या? इस विषय पर कोई चर्चाएं भी नहीं होता थी। हमलोग इस मामले में अनभिज्ञ होते थे। कालांतर में जब मैं कॉलेज गया तो मेरे दो अज़ीज़ प्रोफेसर कम बड़े भाई मिले,जो हमेशा मुझे एक छोटे भाई का प्यार, स्नेह और दुलार दिया। उनमें एक परवेज उल्लाह थे ,जो अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष रहे, बाद में बिहार प्रशासनिक सेवा में जाकर प्रखंड विकास पदाधिकारी बने; तो एक प्रोफ़ेसर शम्स तबरेज खां हुए जो कला एवं संस्कृति में हमेशा विशेष रूचि लेते हुए हम सबके सबसे लोकप्रिय अध्यापक और बड़े भाई थे,जो कालांतर में सिद्धू-कान्हू विश्वविद्यालय, दुमका के प्रतिष्ठित संताल परगना कालेज के उर्दू विभाग के फिलहाल विभागाध्यक्ष सह सिद्धू-कान्हू विश्वविद्यालय के छात्र डीन भी हैं।इन दोनों महान शिक्षकों का मेरे जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। आज़ भी जब मैं उनसे मिलता हूं तो नहीं लगता है कि मैं कबका कालेज से पास आउट हो चुका हूं। मुझे जहां तक याद है कि जब १९८९ में भागलपुर दंगा हुआ, उसके फ़ौरन बाद SFI और DYFI के द्वारा भागलपुर के सबसे प्रतिष्ठित CMS HIGH SCHOOL में पूर्वांचल सांप्रदायिकता विरोधी सम्मेलन हुआ था। जिसे तबके माकपा सांसद सरला माहेश्वरी सहीत,अबके माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य कॉ सलीम और कॉ नीलोत्पल बसु ने सम्मेलन को संबोधित करने के अलावे शहर के प्रमुख चौक चौराहों की नुक्कड़ सभा को भी संबोधित किया था। उसी सांप्रदायिकता फासीवाद विरोधी सम्मेलन में एक क्रांतिकारी साथी कॉ एहतेशाम अहमद उर्फ गुड्डू जिनकी भाषण की ओजस्विता से मैं इतना आकर्षित और प्रभावित हुआ कि उनका बन कर रह गया। मेरे राजनीतिक सुझबूझ के विकास में उनकी अहम योगदान को मैं नहीं बुला सकता।वे मुझे कभी कभी इस क़दर डांटते थे कि देखकर दूसरों के होश उड़ जाय, बावजूद आज़ मैं उनके लिए अपने सगे भाई से कम नहीं हूं।
बहरहाल, आज़ ईद का पावन और मिल्लत का त्योहार है तो आज़ की नफ़रती समाज में मुझे उन दिनों की स्वर्णिम स्मृतियां ख़ुद ब ख़ुद अपने जीवन की फीड बैक में लेते चला गया, जहां से मैं देखता हुं तो लगता है कि मेरा अपना भारत आज़ कहीं हमसे दूर भागता जा रहा है, हमारी सांझी संस्कृति और विरासत पर कोई बुलडोजर चला रहा है और हम-सब जैसे थके-हारे, लाचार हो सिर्फ़ टुकुर-टुकुर ताकते जा रहे हैं। क्या ऐसे में हमसब स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के सपनों का भारत बनाने का सपना साकार कर सकेंगे, अपनी सांझी संस्कृति और विरासत की रक्षा कर सकेंगे और तो और पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य की रक्षा कर सकेंगे ? आज़ जब मैं ईद के अवसर पर लॉ कालेज के सहपाठी अशरफुल हक़ उर्फ़ बादशाह खां, जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष सह कौमी तंजीम के पत्रकार रहे अब्दुल रशीद रहमानिया के दामाद हाज़ी फारूक खां और जहां से मैं साग सब्जी व चिकेन लेता हूं,उन सबसे भेंट मुलाकात की तो यह एहसास हुआ कि आज़ उन सब का हृदयं देश और समाज में वर्तमान नफ़रती फिज़ा से कऱाह रही है। उनके हृदयं में गहरी अवसाद जगह बना रही है। उनकी आत्मा तड़प रही है ? भाईचारा और सद्भावना की जो हम-सब मिशाल देते नहीं थकते थे, आज़ उन सब पर राजसत्ता पोषित हथगोले दागे जा रहें हैं। बावजूद, आज़ भी देश और समाज की बहुसंख्यक आबादी अपनी सांझी संस्कृति और विरासत पर फक़्र करती है।उन सबके बीच आज़ ‘ईद’ उम्मीद की वह रोशनी लेकर आई है, जिसके उजाले में हम-सब मिलकर नफ़रत की हर दीवार तोड़; प्यार-मोहब्बत, सद्भावना, भाईचारा और मिल्लत की ऐसी ब्यार बहायेंगें कि जिसके चमन में हर तरह के फुल खिल-खिलाकर दुनिया भर में हमेशा की तरह अपनी सुगंध बिखेरती रहेगी। मैं अपनी इसी मनोभाव के साथ सभी देशवासियों को ईद मुबारक देते हुए यह गुज़ारिश करता हूं कि नफ़रत पर प्यार के संघर्षों की जज्बा हमेशा अपने हृदयं में जलाए रखें।मेरा विश्वास है कि एक ना एक दिन नफ़रत,क्रोध,भेदभाव और घृणा हारेगी और उस पर प्यार, मोहब्बत, भाईचारा और सद्भावना की जीत निश्चित होगी।एक बार फिर से आप सभी को ईद की बहुत-बहुत हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

सुधीर कुमार रंजन

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