घर तो घर होता है

(आज की तिथि 1 मई को मेरे गृह प्रवेश का स्मरण और गृह निर्माण -अरमान चिंतन को समर्पित पंक्तियाँ)।


बड़े अरमान से ही
घर का निर्माण होता है ।
बालू ईंट पत्थर का तो
झूठा नाम होता है ।

निर्माण का जो सामान है
बस प्रत्यक्ष का एक प्रमाण है ।
भावनाएं जो मिलकर मजबूत बनाते हैं
वह कहांँ सबूत दिखा पाते हैं।

घर बनाने में कितना पैसा लगा
हिसाब की डायरी होती है ।
प्रेम परिश्रम पागलपन तो
रेत पर लिखी शायरी होती है।

घर अंबानी का बने या फिर
अदना सा आदमी का ।
पैसों के पूरी व्यवस्था या फिर
टीस है कुछ कमी का ।
अरमान तो सदा से ही
सबका एक सा मचलता है ।
जब भी कभी सपनों में
किसी का घर पलता है ।

नींव रखने से लेकर गृह प्रवेश तक
ना जाने क्या-क्या जुड़ता है।
हिसाब एक पल में लगा लेना
बुद्धि की अलग विमूढ़ता है ।

अरमानों को पढ़ने का
कोई किताब नहीं होता।
घर तो घर होता है साहब
कोई हिसाब नहीं होता

✍️ संध्या रानी
सहायक शिक्षिका
देवघर।

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