बदले की भावना

आजकल टीवी डिबेट में डिबेट के दौरान डिबेट में भाग लेनेवाले वक्ताओं के द्वारा सत्ता पक्ष के खिलाफ ये वाक्यांश बहुत सुनने को मिलते हैं। ये वाक्यांश, विरोधी पक्ष, एंकर, या जो भी भाग ले रहा होता है, उसके द्वारा बोला जाता है। ये वाक्यांश हैं: “सत्ता पक्ष का यह कार्य बहुत ही निंदनीय है, पॉलिटिकली मोटिवेटेड है, और बदले की भावना से किया गया कार्य है।”

मुझे आज तक यह समझ नहीं आया कि बदले की भावना से किया गया कार्य गलत कैसे हो गया! बदले की भावना का मतलब ही हुआ कि कर्ता के साथ किसी ने कभी अन्याय किया था। तब वह बदला लेने की हालत में नहीं था। आज वह बदला लेने की हालत में है, अतः वह आज किए हुए अन्याय का बदला ले रहा है। कल आपने मेरा घर जलाया था, आज मैं आपका घर जला रहा हूं, यह कार्य गलत कैसे हो गया।जब मैं सत्ता में नहीं था तब आपने मुझे सैकड़ों मुकदमों में फंसाया। आज मैं सत्ता में हूं तो आपको मुकदमों में क्यों नहीं फंसाऊं! कल मेरे निर्दोष होने के बावजूद आपने मुझे जेल में सड़ा दिया था। आज मैं सत्ता में हूं, तो आप द्वारा किए गए अत्याचार का बदला क्यों न लूं! आपको जेल में क्यों न सड़ाऊं! पाकिस्तान ने हमारे देश में घुसपैठ कराई, आतंकवादी भेंजे, बॉम विस्फोट कराया देश की एकता को डिस्टेब्लाइज किया।तब मैं कमजोर था, बदला नहीं ले सका। आज जब मुझे मौका मिला तो मैने सर्जिकल स्ट्राइक कर दी। इसमें गलत क्या है! हां, मैने बदले की भावना से कार्य किया, और आगे भी करूंगा। एक बात और। यदि मुझे पूर्वाभास हो जाय कि अमुक व्यक्ति मुझे धोखा देने की योजना बना रहा है। मेरा कत्ल करना चाह रहा है। तो मेरा यह जन्मसिद्ध अधिकार है कि उसके धोखा देने के पहले मैं उसे धोखा दे दूं, या उसका कत्ल कर दूं। शिवाजी ने बदले की भावना से अथवा धोखे का पूर्वाभास करके अफजल खां का वध कर दिया था। बदले की भावना से ही शाइस्ता खां का हाथ काट दिया था। इसमें गलत क्या हो गया। क्या बदला नहीं लिया जा सकता! क्या अपने प्राण की रक्षा नहीं की जा सकती। क्या किसी को फांका माठ छोड़ दिया जाय, यह कहकर कि “क्षमा बडन को चाहिए, छोटन को उत्पात।” तुम उत्पात करते रहो और मैं बदला भी नहीं लूं। तुम पत्थर बरसाओ और मैं बुलडोजर भी नहीं चलाऊं, आत्मरक्षा में गोली भी नहीं चलाऊं, ये कैसी बात हुई! यदि किसी ने मेरे भाई का कत्ल किया है, तो उसका कत्ल करके मैं बदला तो जरूर लूंगा। अब कानून अपनी तरह से तय करेगा कि मैंने ठीक किया है या गलत। लेकिन धर्म, न्याय और विवेक की दृष्टि से बिलकुल ठीक किया। बदला लेने के मेरे मौलिक अधिकार से कोई मुझे वंचित नहीं कर सकता। भीम ने बदले की भावना से दुर्योधन की जंघा तोड़ दी, और दुशासन की छाती का रक्त पिया तो क्या बदले की भावना से की गई भीम की कार्यवायी को गलत ठहराया जा सकता है? चाणक्य ने तो बदले की भावना से प्रेरित होकर नंद वंश का समूल नाश कर दिया। बदले की भावना से बंचना चाहते हो तो किसी कमजोर को परेशान मत करो ताकि वह शक्तिशाली होने पर तुमसे बदला लेने के लिए अधीर न हो उठे।

मैने सिनेमा में देखा है। विलेन(प्रेम चोपड़ा) हीरो और हीरोइन को बहुत परेशान करता है। हीरो पर जानलेवा हमला करता है। हीरो अपने को बंचाकर पलटवार करता है और प्रेम चोपड़ा के सीने पर पिस्तौल तान देता है। विलेन अपने प्राणों की भीख मांगने लगता है। हीरो उसे प्राणदान देता है। ज्यों ही हीरो मुड़ता है, प्रेम चोपड़ा कहीं से छिपाई हुई पिस्तौल निकालता है, और हीरो पर दाग देता है। यह बात अलग है कि हीरो को कुछ नहीं होता है। वह बुलेटप्रूफ जैकेट पहने हुए है। अब हीरो पलटकर विलेन को गोली मार देता है। विलेन की हत्या कर देता है। अब टीवी पर डिबेट शुरू हो जाता है। हीरो ने बदले की भावना से कार्यवायी की। यह बहुत गलत है। सेना ने बदले की भावना से बुरहान वाणी की हत्या की जो निंदनीय है। सेना के एक कैप्टन ने एक पत्थरबाज को अपनी जीप के आगे बांधकर पत्थरबाजों से अपनी और अपनी टुकड़ी के जवानों की जान बंचाई थी। उसकी बहुत निंदा हुई थी। मानवाधिकार का उल्लंघन बताया गया था। बदले की भावना से की गई कार्यवायी बताया गया था। कानून की नजर में बदले की भावना से की गई कार्यवाइ दंडनीय हो सकती है, लेकिन धर्म और न्याय की नजर से यह वंदनीय है।

राजाराम यादव

साहित्य सेवा मंच के अध्यक्ष तथा

भूतपूर्व प्रशासनिक एवं हिंदी अधिकारी, एचसीएल,

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