मुनव्वर राना पलायन की बात करके अपनी ही शायरियों को झुठला रहे हैं?

लखनऊ : मैं मरूंगा तो यहीं दफ़्न किया जाऊंगा, मेरी मिट्टी भी कराची नहीं जाने वाली। आप समझ गए होंगे हम किसकी बात कर रहे हैं। जी हां, बात हो रही है मशहूर शायर मुनव्वर राना की। कभी मां-मौसी, बेटी और बहन की शायरी करने वाले मुनव्वर की डिक्शनरी में आजकल पलायन लफ्ज बार-बार इस्तेमाल हो रहा है। कहते हैं कि इस बार योगी फिर मुख्यमंत्री बने तो यूपी छोड़ दूंगा, प्रदेश से पलायन कर जाऊंगा। सवाल इस बात का है कि आपको अब उसी यूपी में क्यों दिक्कत होने लगी, जहां की मिट्टी ने आपको अदबी जमात में सिर आंखों पर चढ़ाया। एक नया मुकाम दिया। जिन्ना, पाकिस्तान और पलायन आपकी जुबान पर क्यों आने लगा है? आप क्यों बार-बार कहते हैं कि यूपी का मुसलमान खौफ में है।

आप तब डर, खौफ और पलायन की बात क्यों नहीं कर रहे थे, जब 9 साल पहले मुजफ्फरनगर दंगों की आग में झुलस रहा था। मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं। गले मिलती हुई नदियां गले मिलते हुए मजहब इलाहाबाद में कैसा नजारा छोड़ आए हैं। संगम नगरी में दो मजहब के गले मिलने की शायरी लिखने वाले मुनव्वर साहब आपको हो क्या गया है? आपको ऐसा क्यों लगता है कि मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं। पांच साल के योगी सरकार के कार्यकाल में आप जरा बताइए ऐसी कोई बड़ी घटना, जब मुस्लिम समुदाय को कहीं से पलायन करना पड़ा हो। उल्टे मुजफ्फरनगर से जब 2013 में पलायन हुआ तब आप कहां थे? तब आपको यूपी में डर नहीं लगा और ना ही आपकी जुबान पर मुहाजिर (पलायन करने वाला) होने की बात आई।
मुहाजिरनामा में आप लिखते हैं- जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है, वहीं हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं। मुहर्रम में हमारा लखनऊ ईरान लगता था मदद मौला हुसैनाबाद छोड़ आए हैं।उन्नाव से लखनऊ तक की फिजां आपको क्यों बदली-बदली सी दिखती है? आप बता सकते हैं कि आपके साथ आखिर क्या ज्यादती हुई? आपके बेटे पर प्रॉपर्टी के लिए खुद को गोली चलवाने का आरोप लगा। उसमें भी आपको साजिश नजर आती है, लेकिन होटल और पेट्रोल पंप के सीसीटीवी फुटेज ने असल कहानी बता दी। आपको भी पता है कि तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोलती हैं।

आपने यह भी लिखा है- सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहां जब थे, दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं आप मलिक मोहम्मद जायसी की परंपरा से आए थे। रायबरेली के जायस कस्बे से निकलकर देश-दुनिया के फलक पर छा गए। आपका गजल ट्रांसपोर्ट (मुनव्वर राना की ट्रांसपोर्ट एजेंसी) भी अच्छा चल रहा है। नवाबों के शहर लखनऊ में किसने आपके साथ जोर-जबरदस्ती की, जरा खुलकर बताइए। क्या चुनाव आ गए हैं इसलिए आप पलायन की बात करके ध्यान खींचना चाहते हैं। क्या आपके ये बयान गंगा-जमुनी तहजीब को तार-तार नहीं कर रहे है?

आप ही के अल्फाज में अपनी बात पूरी करना चाहता हूं। मोहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है, सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है। तो आप इस सियासत में उलझेंगे तो कहीं के नहीं रहेंगे। आपका काम है समाज के बीच नफरतों की जगह मोहब्बत का पैगाम देना। आपकी इस नज्म के साथ बात खत्म- नुमाइश के लिए गुलकारियां दोनों तरफ से हैं, लड़ाई की मगर तैयारियां दोनों तरफ से हैं। मुझे घर भी बचाना है वतन को भी बचाना है, मेरे कांधे पे जिम्मेदारियां दोनों तरफ से हैं। आमीन।

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