अपने जोखिम पर बंकरों से बाहर निकले भारतीय छात्र

नई दिल्ली: यूक्रेन के खारकीव, कीव समेत और भी शहरों से भारतीय छात्र अपने रिस्क पर बॉर्डर की तरफ बढ़ रहे हैं। बंकर में जहां भूख-प्यास, घुटन के लिए लड़ना पड़ रहा है, वहीं बंकर से निकलकर खुली सड़क से लेकर बॉर्डर तक मिसाइल, बमबारी, टैंकर्स, रूसी सेना का खौफ है। यूक्रेन के पूर्वी हिस्सों में फंसे छात्रों का कहना कि भारतीय दूतावास से सिर्फ शांत रहने की सलाह मिल रही है और कुछ नहीं। खारकीव में अभी भी कई छात्र बंकरों में कैद हैं, लगातार बमबारी हो रही है।
खारकिव नैशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी के छात्र केरल के कृष्णन जे. कहते हैं, ‘हम जिस बंकर में रह रहे हैं वहां करीब 300-400 छात्र हैं। यहां बहुत ठंड है, कंबल कम हैं, खाने पीने का सामान कम है… और सबसे बड़ी बात यहां कई बार दम घुटता है। ऑक्सिजन की दिक्कत है। हर घंटे बाद मुझे लगता है कि मैं आसमान देखूं, ताजी हवा लूं मगर बहुत डर लगता है। हमें नहीं मालूम है रूसी सैनिक किन सड़कों पर हैं और कब कहां मिसाइल से हमला हो सकता है। दूतावास से बताया जाता है कि अभी हमारा नंबर नहीं आया है। यह कैसा लॉजिक है!’
खारकीव मेडिकल यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट सोनाली कहती हैं, ‘हम हॉस्टल के बंकर में हैं। यहां कुछ मोटी दरियां बिछी हैं। जब रूसी सैनिक खारकीव पहुंचे उसी वक्त हमारे हॉस्टल प्रशासन ने बंकर के बारे में बताया। मुझे पहले उसका आइडिया भी नहीं था। इतने लोगों के लिए एक ही वॉशरूम है। मोबाइल चार्जिंग भी एक मुसीबत है। इसे बार-बार एयरोप्लेन मोड में रखना होता है।’ उड़ीसा की सोनाली कहती हैं, ‘कई बार गड़गड़ाहट की आवाज आती है तो डर लगता है कि कहीं टैंकर्स तो नहीं। कोई ब्लास्ट ना हो जाए। बमबारी ही रही है। हमारा लक्ष्य बॉर्डर तक पहुंचना है।’
केरल के रहने वाले बोगोमोलेट्स नैशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी के छात्र अली कीव में बने बंकर से निकल चुके हैं। कहते हैं, ‘4 दिन बंकर में रहना मेरे लिए बहुत मुश्किल हो रहा था। खाना नहीं था, पीने का पानी बार-बार खत्म हो रहा था। मार्ट में सामान खरीदने वाले बहुत ज्यादा लोग। बंकर में एक आदमी था जिसे अस्थमा था। उसकी परेशानी देखी नहीं जा यही थी और उसी से हौसला मिल रहा था। रेलवे स्टेशन पर पूरा दिन इंतजार करके, पुलिस के धक्के खाकर, हम 220 भारतीय छात्रों को बॉर्डर जाने के लिए ट्रेन मिली।’
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