सवाल सबके मन में है कि हवा किस ओर बह रही है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में सबसे अहम माने जाने वाले विधानसभा चुनावों का इंटरवल आ चुका है। ऐसे में यह सवाल सबके मन में है कि हवा किस ओर बह रही है? अगर पक्के संकेत हों, तब भी चुनावी भविष्यवाणियां करना जोखिम का काम होता है। इसलिए अच्छा होगा कि हम 10 मार्च का इंतजार करें, जिस दिन पांच राज्यों के नतीजे आएंगे। ये नतीजे कई तरह से अहम हैं। देश के अगले राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के चुनाव पर इनका असर होगा। इनसे केंद्र सरकार और बीजेपी की आगामी नीतियां भी प्रभावित होंगी। यह भी पता चलेगा कि 2024 लोकसभा चुनाव से पहले किस राजनीतिक दल का ग्राफ ऊपर की ओर है। इनसे विपक्षी दलों के बीच अलायंस के समीकरण भी तय होंगे। इसके बावजूद यह कहना मुनासिब होगा कि देश में अभी तीन मुख्य राजनीतिक धड़ों यानी बीजेपी और उसके सहयोगी दलों, कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों के कदमों से पता चल रहा है कि मौजूदा हालात को वे किस तरह से देख रहे हैं।

कांग्रेस का संकट
इस तरह का एक संकेत तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने भी दिया है। उन्होंने फेडरल फ्रंट बनाने की अपील की है, जिसका सूत्र धर्मनिरपेक्षता होगा। उनकी अपील का पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा ने तत्काल समर्थन किया। उद्धव ठाकरे से भी केसीआर ने मुलाकात की। उनके बीच बातचीत शायद आगे की संभावनाओं पर केंद्रित रही। इसी तरह की चर्चा ठाकरे और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच भी हो चुकी है। पिछले साल बंगाल में बीजेपी को हराने के बाद ममता राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के विरोध में खुलकर उतर चुकी हैं।

वहीं, केसीआर जो बैठकें कर रहे हैं, उनसे अभी कुछ ठोस भले ही ना निकले, इससे यह जरूर पता चल रहा है कि विपक्षी दलों को बीजेपी को चुनौती देने का एक मौका दिख रहा है। उन्हें लग रहा है कि यूपी में सत्तारूढ़ पार्टी कमजोर पड़ी है। हो सकता है कि यूपी के नतीजे का 2024 लोकसभा चुनाव पर असर ना हो, लेकिन उससे पार्टी का रुख और अंदरूनी समीकरण बदल सकते हैं। इसी तरह से पंजाब और एक हद तक उत्तराखंड, गोवा के नतीजों से तय होगा कि विपक्षी दलों की 2024 की योजना में कांग्रेस कहां फिट बैठेगी?

अभी क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस के रिश्ते के दो तरीके दिख रहे हैं। पहले तरीके का सुझाव ममता बनर्जी ने दिया है। उन्होंने देश भर में कांग्रेस की राजनीतिक जमीन छीनने और उसके नेताओं को अपने पाले में लाने का जो फैसला किया है। हालांकि, इस मामले में उनका समर्थन दूसरे विपक्षी दल तभी करेंगे, जब टीएमसी गोवा में सीटें जीत पाए और पंजाब में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहे। गोवा और पंजाब में ऐसा हुआ तो इसे कांग्रेस का ग्राफ और गिरने का संकेत माना जाएगा।

कांग्रेस और विपक्षी दलों के रिश्तों पर दूसरे मॉडल का सुझाव केसीआर की ओर से आया है, जिसका समर्थन देवेगौड़ा और ठाकरे कर चुके हैं। शायद, शरद पवार भी ऐसा ही चाहते हों। इसमें बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दलों के मोर्चे में कांग्रेस को महत्वपूर्ण जगह देने से इनकार नहीं किया गया है। हालांकि इस पर पंजाब, उत्तराखंड और एक हद तक गोवा और मणिपुर में पार्टी के प्रदर्शन का असर होगा। अगर कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा तो पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं की संख्या बढ़ेगी। इससे गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी आगामी चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। इन राज्यों में 2024 आम चुनाव से पहले चुनाव होंगे और इनमें बीजेपी और कांग्रेस के बीच करीब-करीब सीधा मुकाबला होगा। कांग्रेस आज ऐसे मुकाम पर है, जहां सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उसका वजूद दांव पर लगा है।

आज जहां विपक्षी दलों के बीच बीजेपी के खिलाफ सबसे आगे दिखने की होड़ चल रही है, वहीं केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी का ध्यान यूपी जीतने पर है। अगर बीजेपी को यहां जीत मिलती है तो पक्का हो जाएगा कि हिंदुत्व, सोशल इंजीनियरिंग और आर्थिक कल्याणकारी योजनाओं की मिली-जुली रणनीति से उसे फायदा हो रहा है। हालांकि, इस तरह के संकेत मिल रहे हैं कि 2014, 2017 और 2019 की तुलना में इन मुद्दों की धार कमजोर पड़ी है। यूपी के नतीजों से तय होगा कि आगे पार्टी किन मुद्दों पर चुनाव लड़ेगी। ऐसा कहा जा रहा है कि यूपी में बीजेपी सरकार का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा और उसने कई वादे भी पूरे नहीं किए। इसीलिए वह राजनीतिक रूप से बैकफुट पर दिख रही है। कृषि कानूनों को वापस लेने जैसे कदमों और बेरोजगारी जैसे मुद्दों से इसका अंदाजा लग रहा है। इसलिए चुनाव प्रचार में पार्टी 2017 के बाद हुए विकास की चर्चा नहीं कर रही। उसका जोर 2017 से पहले और बाद में आए बदलाव पर है। इसीलिए पार्टी ने ‘फर्क साफ है’ का नारा भी दिया है।

कौन है सही
यूपी में बीजेपी ने जो सोशल अलायंस बनाया था, उस पर भी साफ दबाव दिख रहा है। यहां की हालत महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा जैसी है। इन राज्यों में पार्टी ने उन समुदायों से प्रदेश स्तर पर शीर्ष नेतृत्व चुना, जो सम्मानित सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं और जिनका राजनीतिक दबदबा नहीं है। यूपी के नतीजों से पता चलेगा कि क्या ऊंची जाति के नेताओं को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला सही था? अन्य राज्यों में मिली हार के बाद पार्टी ने इस रणनीति में बदलाव किया। उसने केंद्र और राज्यों में ओबीसी के अधिक नेताओं को मंत्री बनाया। लेकिन क्या यह फैसला सही समय पर लिया गया, इसका जवाब भी यूपी के नतीजों से मिलेगा।

बीजेपी ने ‘नए भारत’ का नारा दिया था, लेकिन यूपी में वह सब्सिडी और दूसरी कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर वोट मांग रही है। इसके साथ उसने अल्पसंख्यकों की पहचान और संस्कृति के खिलाफ भी आक्रामकता बढ़ाई है। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी और आरएलडी का चुनावी अभियान इस विश्वास पर केंद्रित है कि राज्य के लोगों की अपेक्षाएं बढ़ी हैं। दोनों में कौन सही है, इसका पता 10 मार्च को चलेगा।

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