भारत को क्या करना चाहिए? क्या कहती है चाणक्य नीति,मित्र रूस ने यूक्रेन पर किया हमला

नई दिल्ली: रूस के यूक्रेन पर आक्रमण करने के बाद दुनियाभर के देश अलग-अलग खेमों में बंट गए। यूक्रेन के साथ अमेरिका, ब्रिटेन, जापान जैसे देश आ गए तो रूस के समर्थन में चीन समेत कई देश खड़े दिखे। भारत ने शांति से बातचीत के जरिए समाधान निकालने की बात तो की लेकिन वह तटस्ठ बना हुआ है। इधर, यूक्रेन पर रूस के हमले को एक हफ्ते बीत रहे हैं। भारत के लोगों में एक तरफ रूस के समर्थन की बात हो रही है तो रोते मासूम बच्चों और तबाही की खौफनाक तस्वीरें देख देशवासियों की आंखें नम हो रही हैं। इस बात पर डिबेट हो रही है कि आखिर भारत को ऐसे वक्त में ताकतवर रूस का साथ देना चाहिए या कमजोर दिखने वाले यूक्रेन का। दोनों के पक्ष में खड़े होने के अपने-अपने तर्क है। ऐसे समय में चाणक्य नीति जरूर भारत को इस दुविधा से निकाल रही है।

चाणक्य नीति क्या कहती है?
पिछले दिनों रूस के हमले के कुछ घंटे बाद ही भारत में यूक्रेन के राजदूत ने देश के गौरवशाली इतिहास का वास्ता दिया। उन्होंने चाणक्य और महाभारत का जिक्र किया था और भारत से मदद की अपील की। ट्विटर पर #istandwithrussia और #StopPutinNOW जैसे हैशटैग चल रहे हैं। ऐसे माहौल में अगर हम इस दुविधा का समाधान भारत की सदियों पुरानी कूटनीतिक परंपरा में ढूंढें तो क्या मिलता है? इसमें सबसे बड़ा नाम चाणक्य नीति है।
मित्र कौन है?
आचार्य चाणक्य की बरसों पुरानी शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने सच्चे मित्र की बेहतरीन परिभाषा दी है। उनका कहना है कि सच्चा मित्र वो है जो संकट आने पर आपकी मदद के लिए तैयार रहे। जो दोस्त परेशानियों को समझ सके और आपकी मदद करे वही सच्चा दोस्त है। चाणक्य नीति में साफ कहा गया है, ‘मित्र की पहचान विपत्ति के समय ही होती है।’

जब सारा संसार विपत्ति में फंसे हुए व्यक्ति को अकेला छोड़ देता है तो उस समय सहानुभूति रखने वाला व्यक्ति ही मित्र कहलाता है।

चाणक्य नीति

रूस ने भारत के लिए क्या-क्या किया
आजादी के फौरन बाद से कश्मीर मुद्दे पर रूस भारत के साथ खड़ा रहा। पाकिस्तान ने यूएन में प्रस्ताव रखा तो सोवियत संघ ने वीटो पावर का इस्तेमाल किया। 1961 में पुर्तगालियों से गोवा को आजाद कराने पर भी रूस भारत के साथ खड़ा रहा। पाकिस्तान ने बार-बार कश्मीर मामले को अंतरराष्ट्रीय पटल पर उछालने की कोशिश की। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय भी सोवियत ने वीटो पावर का इस्तेमाल किया। वह रूस ही था जो लगातार कश्मीर पर पाकिस्तान की एक न चलने दी। ऐसे समय में जब चीन पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखता है, रूस ने हमेशा भारत का साथ दिया है।

चाणक्य का मत, करो वही जिससे राष्ट्र का हित हो
चाणक्य कहते हैं कि विदेश नीति इस तरह से होनी चाहिए जिससे राष्ट्र का अहित न हो। उसकी सुरक्षा में किसी प्रकार की बाधा न पड़े। यह किसी भी देश के कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक होता है। यह भी कहा गया है कि प्रत्येक राष्ट्र को पड़ोसी देशों के व्यवहार के अनुरूप संधि और विग्रह करते रहना चाहिए। इससे देश में राज्य-व्यवस्था स्थिर रहती है।

शत्रु अधिक ताकतवर हो तो जोश दिखाने के बजाय होश से काम लेना चाहिए। ऐसे में शत्रु को ललकारने में बुद्धिमानी नहीं है। यदि उस समय पीछे हटना पड़े, तो हट जाएं। बाद में योजनाबद्ध तरीके से शत्रु का सामना करना चाहिए।

चाणक्य नीति

पड़ोस में मित्र और शत्रु का पैमाना
चाणक्य नीति कहती है कि किसी राष्ट्र के निकटवर्ती राज्य या वहां के लोग भी शत्रु बन जाते हैं। शत्रु राष्ट्र के पड़ोसी जिसकी सीमाएं शत्रु राष्ट्र से मिल रही हों उसकी भी हमारे शत्रु राष्ट्र से शत्रुता रहनी स्वाभाविक है। ऐसे में वह उस शत्रु के खिलाफ हमारा मित्र बन जाता है। इसके तहत सलाह दी गई है कि राजा यानी राष्ट्र को चाहिए कि वह अपने पड़ोसी शत्रु राष्ट्र से शत्रुता रखने वाले राष्ट्रों को अपना मित्र बना ले। कूटनीति का यह एक महत्वपूर्ण अंग है।
इस लिहाज से देखें तो चीन की विस्तारवादी नीति और डोकलाम व पूर्वी लद्दाख में हिमाकत को देखते हुए भारत रूस को नाराज नहीं कर सकता है। वैसे भी, रूस से अब तक भारत को किसी तरह का नुकसान नहीं, फायदा ही होता आया है। चाणक्य यह भी कहते हैं कि बड़े और ताकतवर देशों के साथ मित्रता में ही फायदा है।

जब अमेरिका था विरोध में
अमेरिका और रूस में चले शीत युद्ध के समय अमेरिका भारत का विरोधी हुआ करता था, उस समय रूस ने भारत की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया था। आगे चलकर रूस से भारत की मित्रता मजबूत होती गई।

चाणक्य नीति को आगे रखकर अगर राष्ट्रहित को देखें तो संयुक्त राष्ट्र में पूरब और पश्चिम के बीच बने विवाद में भारत का भाग लेना उचित नहीं लगता है। ऐसे समय के लिए ही शायद, चाणक्य ने मध्यम मार्ग के बारे में बताया है। इसके तहत व्यक्ति को किसी वस्तु या विचार में न तो ज्यादा लिप्त होना चाहिए और न ही उसका सर्वथा परित्याग करना चाहिए। मध्यम मार्ग में दोनों छोरों का परित्याग करना पड़ता है और एक बीच का रास्ता अपनाना पड़ता है और भारत फिलहाल यही करता दिख रहा है।

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